गाँधीजी की हत्या, नाथूभाई की मनोव्यथा और नहेरु की राजनीती | Gandhiji Ki Hatya, Nathubhai Ki Manovyatha Aur Nehru Ki Rajniti | Part #1 - Bagavat Of Anonymous

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Tuesday, June 25, 2019

गाँधीजी की हत्या, नाथूभाई की मनोव्यथा और नहेरु की राजनीती | Gandhiji Ki Hatya, Nathubhai Ki Manovyatha Aur Nehru Ki Rajniti | Part #1

आज हम इस आर्टिकल में बात करनेवाले है तथाकथित महात्मा गाँधी की हत्या के बारे में की गाँधी जी की हत्या क्यों हुई क्यों हुई यह तो हम सब जानते है इसमें कोई नयी बात नहीं है. आज हम उस कारन का का विश्लेषण करेंगे की नाथूभाई की क्या मनवयथा रही होगी उस टाइम की उन्होंने गांधीजी को गोली मारी.

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में इस हत्या को सही नहीं मानता, क्यों की गांधीजी की हत्या से तो कांग्रेस का ही फायदा हुआ. गांधीजी की हत्या करने की जगह उनको एक्सपोज़ करना चाहिए था की वो अंग्रेजो के एजेंट है अंग्रेजो के इशारे पर काम करते थे.उनकी हत्या से तो गाँधीवाद को और 70 साल का आयुस्य मिल गया.

पूरा मामला पूरी घटना इस तरह थी की उस समय गांधीजी ने इस बात पे आंदोलन किया था की भारत सरकार पाकिस्तान को 75 करोड़ रुपीया दे.अगर हम उस समय का एक रूपया आजसे कंपेर करे तो उस समय का 1 रूपया आजके 300 रुपया के बराबर हुआ इ प्रमाण सोने से मापा गया है.

उस समय भारतकी आबादी थी 35 करोड़ और पाकिस्तान की आबादी थी 3.5 करोड़ के आसपास (१९४७-१९४८). तो गांधीजी ने जो बात की थी की पाकिस्तान को 55 करोड़ दो तो इसका मतलब हुआ की भारत के हर नागरिक के पास से 1.60 रुपया लो और पाकिस्तान के हर नागरिक को 16-16 रुपया दो.आज के हिसाब से हमें 1.60 रूपया कुछ नहीं लगेगा लेकिन आज से कंपेर करे तो भारत के नागरिक के पास से 500-500 रूपया लो और पाकिस्तान के हर नागरिक को 5000-5000 रुपया दो.

उस समय परिस्थिति ये थी की पाकिस्तानियो ने करोडो भारतीय की हत्या की थी लोगो का अपहरण किया था और 1.5 करोड़ के आसपास के लोग पाकिस्तान से भारत भाग कर आये थे उनके पैसे ज़ेवरात और प्रॉपर्टीस को छोड़ कर उन लोगो का सब कुछ लूट लिया गया था.

इस परिस्तिथि को इस तरह आप समझ सकते है की आप हो आपके परिवार है आपके करीब के 10-15 रिस्तेदार है. और आपके एक दूरके रिस्तेदार को जो दूसरी जगह रहता है उसको किसी गुंडे ने पिट पिट कर लहू लोहान कर दिया उसका घर जला दिया उसके पैसे हड़प लिए और वह से भाग ने के लिए मज़बूर कर दिया.इसलिए वो आपके पास शरण मांगने के लिए आता है और कोई अपने आप को शांतिदूत बोलने वाला सेक्युलर आ कर आपसे बोलता है की आप सब 500-500 रुपया मुझे दो क्योकि मुझे उस गुंडे को 5000 रुपया की मदद करनी है.यहाँ आपका रिस्तेदार अपना सब कुछ गवा कर आपसे मदद मांगने आया है और इस तरह का स्वघोसित शांतिदूत सेक्युलर अप्पकी मदद करने की बात दूर रही और आपको उस गुंडे को 5000 रुपया देने की बात करता है तब आप की क्या मनोव्यथा होगी बिलकुल इस तरह की मनोव्यथा नाथूभाई की और 35 करोड़ भारतीयों की थी उस वक्त.

भारतीयों को पता था की उस समय तक करोडो भारतीयों की पाकिस्तान मई हत्या कर दी गयी थी करोडो लोगो की सम्पति को लूट लिया गया था लाखो लोगो का अपहरण कर लिया गया था और यहाँ तथाकथित महात्मा गांधीजी उन लोगो की मदद करने की बजाये ये कहते है की 35 करोड़ भारतीय अपनी महेनत की कमाई का 1.60 रुपया मुझे दे और में हर एक पाकिस्तानी को 16-16 रुपया देना हे मतलब आज के हिसाब से हर एक भारतीय से 500-500 रुपया लेना और हर पाकिस्तानी को 5000-5000 रुपया देना.और इसी बात का नाथूभाई को गुस्सा आ गया और और उन्हों ने गांधीजी की हत्या कर दी ये काम 100% गलत था इसको हम बिलकुल सपोर्ट नहीं करते और करना भी नहीं चाहिए.

गांधीजी क्या चरस पिते थे, दारू पिते थे जो उन में 35 करोड़ भारतीयो से यह बात कहने की हिम्मत हुई की तुम हर एक भारतीय मुझे 1.60-1.60 रुपया यानि आज के हिसाब से 500-500 रुपया दो, क्योकि मुझे हर एक पाकिस्तानी गुंडो को 16-16 रुपया यानि आज के हिसाब से 5000-5000 रुपया देने है उन पाकिस्तानी को जिन्होंने करोडो भारतीयों को मार डाला था करोड़ों भारतीयों की सम्पत्ति लूट ली थी, लाखो लोगो का अपहरण किया था.

यह बात कहने का दुःसाहस गाँधी जी मन में कैसे आया ? क्यों की करोलबाग़ में जहा गांधीजी का आश्रम था जहा गांधीजी रहते थे, वहीं के आम लोगो ने यानी वो कोई आरएसएस या बीजेपी के नहीं, बल्कि वहाँ आसपास रहने वाले आम नागरिको ने आश्रम में जा कर किसी कि पिटाई नहीं कीं बल्कि सिर्फ आश्रम में जो कुछ था वो सब बहार ला कर तोड़ दिया. जब ये सब हुआ तो गांधीजी कोलकाता गए हुए थे, इस लिए वहाँ के आम लोगोने आश्रम के जो कर्मचारियों थे उनको कहा की " यहाँ से गाँधी का फोटो निकालो और गाँधी को बोल देना की वो यहाँ न आये और आ गया तो बहोत बुरी तरह पितेगा " मतलब इस समय तक गांधीजी का पुरे देश में बहिस्कार होना शरू हो गया था.

जब गांधीजी दिल्ही पहोचे और कार में बैठे तो ड्राइवर ने कार चालू की तो गांधीजी ने पूछा की " कहा ले जा रहे हो " तो ड्राइवर ने कहा की " आप के आश्रम करोलबाग " तो गाँधी जी ने " कहा की नहीं वहाँ नहीं बिरला मंदिर ले चलो " क्योकि, उनके अनुयायिओं ने उनको पहले से ही सब बता दिया था. तो इस लिए उनमे इतनी हिम्मत नहीं थी वो अपने आश्रम जो ज्यादा बड़ा नहीं था वहाँ जाये, तो इस लिए गांधीजी ने करोलबाग़ जाने की बजाये बिरला मंदिर में जाने के लिए बोलै, क्योकि बिरला मंदिर एक प्राइवेट प्रॉपर्टी थी इस लिए वहाँ आ कर कोई मार पिट नहीं करेगा. लेकिन गान्धीजी मे वो बात कहने की हिम्मत कहाँ से आयी, उसकी एक और भी वजह है जो मुझे लगती है की एक बार एक बिल्ली दूसरी बिली को कह रही थी की " कल में उस बुल डॉग की जम कर पिटाई करूगी " बुल डॉग सबसे ताकतवर कुत्ता होता है बिली ने कहा की " में उस कुत्ते को बहोत मरूँगी बहोत पिटाई करूगी " तो ये बात सून कर दूसरी बिल्ली ने कहा " की तू बुल डॉग को कैसे मारेगी वो तो बहोत बड़ा और ताकतवर कुत्ता है " तो पहेली बिली जो बुल डॉग को मार ने की बात कर रही थी उसने दूसी बिल्ली को अखबार दिखाया और कहा की " ये देखो इस अखबार में लिखा हे, की में शेर हूँ " .

तो उस समय गांधीजी के साथ भी यही हुआ की पेड मीडिया ने उनको इतना उछाला की वो अपने आप को पता नहीं क्या समझ रहे थे.


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