गाँधीजी की हत्या, नाथूभाई की मनोव्यथा और नहेरु की राजनीती | Gandhiji Ki Hatya, Nathubhai Ki Manovyatha Aur Nehru Ki Rajniti | Part #2 - Bagavat Of Anonymous

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Tuesday, June 25, 2019

गाँधीजी की हत्या, नाथूभाई की मनोव्यथा और नहेरु की राजनीती | Gandhiji Ki Hatya, Nathubhai Ki Manovyatha Aur Nehru Ki Rajniti | Part #2

अगर पेड मीडिया किसी की इतनी तारीफ करता है तो स्वाभाविक है की कोई भी इंसान अपने आप को भगवान समाज लेगा. बिलकुल उसी तरह जैसे अखबार वालो ने बिली को शेर बोल दिया की बिल्ली शेर है तो ये सुन कर बिल्ली बुल डॉग से लड़ ने की बात करने लगी. तो इसी तरह गाँधी जी के मन में भी ये बात करने की हिम्मत आ गयी उस वक्त के पेड मीडिया की महेरबानी से. गाँधीजी ने 35 करोड़ भारतीयों को बोल दिया अपनी महेनत का 1.60 मुझे दो और 55 करोड़ रुपया इकठ्ठा होंगे वो पाकिस्तान के गुंडों और इस्लामिक जिहादी को दे देंगे. ऐसे में हमें नाथूभाई की वेदना को समझना चाहिए क्यों की वो अपने आपको साधारण भारतीय से अपने आप को आइडेंटीफाई करते थे, नाथूभाई तथाकथित महात्मा गाँधी की तरह लुच्चा नहीं थे. वो बिलकुल सीधेसादे साधारण इंसान थे एक सेंस में देखे तो नाथूभाई भोले इंसान थे वो अपने आप को आम हिंदुस्तानी से Associate करते थे. 


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सब हिन्दुस्तानियो को तथाकथित महात्मा गाँधी की ये बात सुन कर बहोत बुरा लगा होगा की जिन जिन्दीओ ने करोडो भारतीयों को कत्लेआम किया उन लोगो को 55 करोड़ देने की बात कर रहा है और इसी बात का 35 करोड़ भारतीयों को बुरा लगा लेकिन नाथूभाई को कुछ ज्यादा ही बुरा लगा.

उस समय से देखे तो 1.60 रुपया आज से कही ज्यादा हुआ करते थे उस समय बॉम्बे जैसे बड़े शहरों में एक दिन की मज़दूरी चवन्नी हुआ करती थी. तो इस हिसाब से 1.60 रुपया मतलब एक सामान्य भारतीय की 6-7 दिन की मज़दूरी होती थी तब 1.60 रुपया मिलता था और इस परिस्थिति में गांधीजी ने इस तरह की बात की तो जाहिर है की हर सामान्य भारतीय को भी बुरा लगेगा गुस्सा आएगा. तो इस परिस्थिति में नाथूभाई को भय लगने लगा की कही गांधीजी आंदोलन करके कही सच में पाकिस्तानी गुंडो को 55 करोड़ दिलवा दिए तो वो बॉम्ब्स खरीद कर हम पैर ही हमला कर देंगे. अगर तथाकथित महात्मा गाँधी के बयान के बाद अगर पार्लियामेंट में ये प्रस्ताव पास हो जाता " की गांधीजी कुछ भी कर ले लेकिन भारत सरकार पाकिस्तान को एक चवन्नी भी नहीं देंगे चाहे गांधीजी जितने भी आंदोलन कर ले. "

तो इस बात से नाथूभाई को आश्वासन मिल जाता की 55 करोड़ पाकिस्तान में नहीं जायेंगे. अगर ऐसा होता हो नाथूभाई गांधीजी की हत्या नहीं करते उनको गांधीजी की हत्या हत्या करने का तो कोई शोख था नहीं. लेकिन नाथूभाई को ये भय मन में बैठ गया था की अगर कही गाँधी जी आंदोलन करेंगे और जवाहर नहेरु इस बात को बहाना बना कर पाकिस्तान को 55 करोड़ दे देंगे की गांधीजी ने आंदोलन किया था तो उनकी वजह से हमने पाकिस्तान को 55 करोड़ दिए.

उस समय पाकिस्तान का भारत से युद्ध चल रहा था. तो अगर ऐसी हालत में पाकिस्तान के पास 55 करोड़ आ जाते तो फिर वो अमेरिका और ब्रिटेन से और भी ज्यादा मात्रा में गोला बारूद और लड़ाकू विमान खरीद कर और ज्यादा हमला करता और भी भारतीयों का नरसंहार होता. तो उस समय नहेरु सरकार अगर उस बिल को पास कर देती पार्लियामेंट में की " भारत सरकार किसी भी परिस्थिति में पाकिस्तान को 55 करोड़ नहीं देगी "

ओर साथ में जब गाँधी जी ने वो बात कही तो उसी वक्त गांधीजी को अरेस्ट कर लेना चाहिए था. क्योकि उनकी डिमांड एंटीनेशनल थी जो उन्होंने बात की 55 करोड़ रुपया पाकिस्तान को देने की वो तो देशद्रोह हुआ. गांधीजी उस समय दुश्मन देश की मदद कर ने की बात कर रहे थे. अगर गांधीजी को देशद्रोह के आरोप में अरेस्ट कर लिया होता तो नाथूभाई उनका बाल भी बाक़ा नहीं करते. नाथूभाई की गांधीजी से कोई जाती दुश्मनी तो थी नहीं.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ फिर भी नाथूभाई को गांधीजी की हत्या नहीं करनी चाहिए थी. बल्कि गाँधी जी को एक्सपोज़ करना चाहिए था की गाँधीजी पेड मीडिया के दम पर उछल रहे है और अंग्रेजो के एजेंट है. नाथूभाई के इस कदम की वजह से गाँधी परिवार ने 70-70 साल तक भारत पर राज किया और अभी तक गाँधीवाद को बढ़ावा मिला.

मान लो की अगर नाथूभाई ने गांधीजी की हत्या न की होती तो भारत के आम लोगो ने तो Already गांधीजी का विरोध करना चालू कर दिया था. जैसे करोलबाग में वहां के आम लोगो ने गांधीजी का आश्रम तोड़ दिया था और गाँधी जी को धमकी दी थी " वो यहाँ दुबारा आएंगे तो हाथ पाव तोड़ देंगे " और इस से डर कर गांधीजी बिरला मंदिर में जाकर छुप गए थे.

अगर नाथूभाई गाँधी जी की हत्या न करते तो तो ये ट्रेंड पुरे देश में शरू हो जाता. पुरे देश में गाँधी जी का बहिस्कार शरू हो जाता और 35 करोड़ भारतीय एक स्वर में गांधीजी को कहते की " भाई तू अपना नाम मोहनदास करमचंद से बदल कर महोम्मद कासिम रख ले और पाकिस्तान चला जा. "

पूरा हिंन्दुस्तान उसको देश से बहार निकलता कहता की " भाई तू पाकिस्तान चला जा वही रहना वापस आने की कोई जरूरत नहीं है " क्योंकी लोगो को पता चलने लगा था गांधीजी सिर्फ Publicity के लिए सब कर रहे है ताकी उनकी तस्वीर अखबार के फ्रंट पेज पर छपे. इस लिए पुरे देश में विरोध हो रहा था गांधीजी का. क्यों की सब लोगो को पता चल रहा था की गांधीजी अंग्रेजो के इशारे पर काम करते थे और उनका नाम रेडियो और अखबार के पहले पेज पर आये.

अगर उस समय ही गांधीजी के फॉर्मूले से उनको हि जवाब देना चाहिए था की " जाइये कराची में जा कर आंदोलन कीजिये. " क्योकि गांधीजी की इतनी हिम्मत नहीं थी की वो कराची, इस्लामाबाद जा कर आंदोलन कर सके. क्योकि इन जगह पर बड़ी मात्रा में कत्ले आम हो रहा था और गांधीजी की इतनी हिम्मत नहीं थी की वो वह जा सके क्योकि उनको पता था की अगर वो वहा पाकिस्तान गए तो उनको काटके फेक देंगे. गांधीजी जब तक जिन्दा थे तब तक कहते रहे की 15 दिन बाद जा रहा हु पाकिस्तान लेकिन वो हर बार कह ते रहे लेकिन वो 15 दिन कभी नहीं आये. आखिर में उन्होंने 15 जनवरी को भी कहा था की 7 दिन बाद पाकिस्तान जानेवाला हु, लेकिन वो गए ही नहीं और आंदोलन पर उतर गए.



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